तब शरणागतभयहारी धर्मवत्सल भगवान् शंकरने अपने दर्शनसे प्रसन्न हुए उन धर्मज्ञ और शीलसम्पन्न राजकुमारोंसे प्रसन्न होकर कहा॥ २६॥
स तान् प्रपन्नार्तिहरो भगवान्धर्मवत्सलः।
धर्मज्ञान् शीलसम्पन्नान् प्रीतः प्रीतानुवाच ह॥ २६
तब शरणागतभयहारी धर्मवत्सल भगवान् शंकरने अपने दर्शनसे प्रसन्न हुए उन धर्मज्ञ और शीलसम्पन्न राजकुमारोंसे प्रसन्न होकर कहा॥ २६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.24.26 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 526) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/24/26/