श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.24.35

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

सङ्कर्षणाय सूक्ष्माय दुरन्तायान्तकाय च।

नमो विश्‍वप्रबोधाय प्रद्युम्नायान्तरात्मने॥ ३५

saṅkarṣaṇāya sūkṣmāya durantāyāntakāya ca|

namo viśvaprabodhāya pradyumnāyāntarātmane|| 35

अर्थ

आप ही सूक्ष्म (अव्यक्त), अनन्त और मुखाग्‍निके द्वारा सम्पूर्ण लोकोंका संहार करनेवाले अहंकारके अधिष्ठाता संकर्षण तथा जगत‍्के प्रकृष्ट ज्ञानके उद्गमस्थान बुद्धिके अधिष्ठाता प्रद्युम्न हैं; आपको नमस्कार है॥ ३५॥

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