॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.24.50
पूररेचकसंविग्नवलिवल्गुदलोदरम् ।
प्रतिसंक्रामयद्विश्वं नाभ्याऽऽवर्तगभीरया॥ ५०
pūrarecakasaṃvignavalivalgudalodaram |
pratisaṃkrāmayadviśvaṃ nābhyā''vartagabhīrayā|| 50
अर्थ
उसका त्रिवलीसे सुशोभित, पीपलके पत्तेके समान सुडौल उदर श्वासके आने-जानेसे हिलता हुआ बड़ा ही मनोहर जान पड़ता है। उसमें जो भँवरके समान चक्करदार नाभि है, वह इतनी गहरी है कि उससे उत्पन्न हुआ यह विश्व मानो फिर उसीमें लीन होना चाहता है॥ ५०॥