जिस साधकका चित्त भक्तियोगसे अनुगृहीत एवं विशुद्ध होकर न तो बाह्य विषयोंमें भटकता है और न अज्ञान-गुहारूप प्रकृतिमें ही लीन होता है, वह अनायास ही आपके स्वरूपका दर्शन पा जाता है॥ ५९॥✎ 414
न यस्य चित्तं बहिरर्थविभ्रमं
तमोगुहायां च विशुद्धमाविशत्।
यद्भक्तियोगानुगृहीतमंजसा
मुनिर्विचष्टे ननु तत्र ते गतिम्॥ ५९
जिस साधकका चित्त भक्तियोगसे अनुगृहीत एवं विशुद्ध होकर न तो बाह्य विषयोंमें भटकता है और न अज्ञान-गुहारूप प्रकृतिमें ही लीन होता है, वह अनायास ही आपके स्वरूपका दर्शन पा जाता है॥ ५९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.24.59 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 530) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/24/59/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)