श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.24.59

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

न यस्य चित्तं बहिरर्थविभ्रमं

तमोगुहायां च विशुद्धमाविशत्।

यद्भक्तियोगानुगृहीतमंजसा

मुनिर्विचष्टे ननु तत्र ते गतिम्॥ ५९

na yasya cittaṃ bahirarthavibhramaṃ

tamoguhāyāṃ ca viśuddhamāviśat|

yadbhaktiyogānugṛhītamaṃjasā

munirvicaṣṭe nanu tatra te gatim|| 59

अर्थ

जिस साधकका चित्त भक्तियोगसे अनुगृहीत एवं विशुद्ध होकर न तो बाह्य विषयोंमें भटकता है और न अज्ञान-गुहारूप प्रकृतिमें ही लीन होता है, वह अनायास ही आपके स्वरूपका दर्शन पा जाता है॥ ५९॥✎ 414

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #414 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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