श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.24.75

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

श्रेयसामिह सर्वेषां ज्ञानं निःश्रेयसं परम्।

सुखं तरति दुष्पारं ज्ञाननौर्व्यसनार्णवम्॥ ७५

śreyasāmiha sarveṣāṃ jñānaṃ niḥśreyasaṃ param|

sukhaṃ tarati duṣpāraṃ jñānanaurvyasanārṇavam|| 75

अर्थ

इस लोकमें सब प्रकारके कल्याण-साधनोंमें मोक्षदायक ज्ञान ही सबसे श्रेष्ठ है। ज्ञान-नौकापर चढ़ा हुआ पुरुष अनायास ही इस दुस्तर संसारसागरको पार कर लेता है॥ ७५॥

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