भगवान् ही सम्पूर्ण कल्याणसाधनोंके एकमात्र प्यारे—प्राप्तव्य हैं। अतः मेरे गाये हुए इस स्तोत्रके गानसे उन्हें प्रसन्न करके वह स्थिरचित्त होकर उनसे जो कुछ चाहेगा, प्राप्त कर लेगा॥ ७७॥✎ 416
विन्दते पुरुषोऽमुष्माद्यद्यदिच्छत्यसत्वरम्।
मद्गीतगीतात्सुप्रीताच्छ्रेयसामेकवल्लभात्॥ ७७
भगवान् ही सम्पूर्ण कल्याणसाधनोंके एकमात्र प्यारे—प्राप्तव्य हैं। अतः मेरे गाये हुए इस स्तोत्रके गानसे उन्हें प्रसन्न करके वह स्थिरचित्त होकर उनसे जो कुछ चाहेगा, प्राप्त कर लेगा॥ ७७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.24.77 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 533) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/24/77/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)