श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.24.79

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

गीतं मयेदं नरदेवनन्दनाः

परस्य पुंसः परमात्मनः स्तवम्।

जपन्त एकाग्रधियस्तपो मह-

च्चरध्वमन्ते तत आप्स्यथेप्सितम्॥ ७९

gītaṃ mayedaṃ naradevanandanāḥ

parasya puṃsaḥ paramātmanaḥ stavam|

japanta ekāgradhiyastapo maha-

ccaradhvamante tata āpsyathepsitam|| 79

अर्थ

राजकुमारो! मैंने तुम्हें जो यह परमपुरुष परमात्माका स्तोत्र सुनाया है, इसे एकाग्रचित्तसे जपते हुए तुम महान् तपस्या करो। तपस्या पूर्ण होनेपर इसीसे तुम्हें अभीष्ट फल प्राप्त हो जायगा॥ ७९॥✎ 416

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे रुद्रगीतं नाम चतुर्विंशोऽध्यायः॥ २४॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #416 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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