॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.25.14
प्राकारोपवनाट्टालपरिखैरक्षतोरणैः ।
स्वर्णरौप्यायसैः शृङ्गैः संकुलां सर्वतो गृहैः॥ १४
prākāropavanāṭṭālaparikhairakṣatoraṇaiḥ |
svarṇaraupyāyasaiḥ śṛṅgaiḥ saṃkulāṃ sarvato gṛhaiḥ|| 14
अर्थ
सब ओरसे परकोटों, बगीचों, अटारियों, खाइयों, झरोखों और राजद्वारोंसे सुशोभित था और सोने, चाँदी तथा लोहेके शिखरोंवाले विशाल भवनोंसे खचाखच भरा था॥ १४॥