श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.25.17

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

पुर्यास्तु बाह्योपवने दिव्यद्रुमलताकुले।

नदद्विहंगालिकुलकोलाहलजलाशये ॥ १७

puryāstu bāhyopavane divyadrumalatākule|

nadadvihaṃgālikulakolāhalajalāśaye || 17

अर्थ

उस नगरके बाहर दिव्य वृक्ष और लताओंसे पूर्ण एक सुन्दर बाग था; उसके बीचमें एक सरोवर सुशोभित था। उसके आस-पास अनेकों पक्षी भाँति-भाँतिकी बोली बोल रहे थे तथा भौंरे गुंजार कर रहे थे॥ १७॥

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