॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.25.29
नासां वरोर्वन्यतमा भुविस्पृक्
पुरीमिमां वीरवरेण साकम्।
अर्हस्यलङ्कर्तुमदभ्रकर्मणा
लोकं परं श्रीरिव यज्ञपुंसा॥ २९
nāsāṃ varorvanyatamā bhuvispṛk
purīmimāṃ vīravareṇa sākam|
arhasyalaṅkartumadabhrakarmaṇā
lokaṃ paraṃ śrīriva yajñapuṃsā|| 29
अर्थ
सुभगे! तुम इनमेंसे तो कोई हो नहीं; क्योंकि तुम्हारे चरण पृथ्वीका स्पर्श कर रहे हैं। अच्छा, यदि तुम कोई मानवी ही हो, तो लक्ष्मीजी जिस प्रकार भगवान् विष्णुके साथ वैकुण्ठकी शोभा बढ़ाती हैं, उसी प्रकार तुम मेरे साथ इस श्रेष्ठ पुरीको अलंकृत करो। देखो, मैं बड़ा ही वीर और पराक्रमी हूँ॥ २९॥