दिष्ट्याऽऽगतोऽसि भद्रं ते ग्राम्यान् कामानभीप्ससे।
उद्वहिष्यामि तांस्तेऽहं स्वबन्धुभिररिन्दम॥ ३६
diṣṭyā''gato'si bhadraṃ te grāmyān kāmānabhīpsase|
udvahiṣyāmi tāṃste'haṃ svabandhubhirarindama|| 36
अर्थ
शत्रुदमन! आप यहाँ पधारे, यह मेरे लिये सौभाग्यकी बात है। आपका मंगल हो। आपको विषय-भोगोंकी इच्छा है, उसकी पूर्तिके लिये मैं अपने साथियोंसहित सभी प्रकारके भोग प्रस्तुत करती रहूँगी॥ ३६॥✎ 13361337
दिष्ट्याऽऽगतोऽसि भद्रं ते ग्राम्यान् कामानभीप्ससे।
उद्वहिष्यामि तांस्तेऽहं स्वबन्धुभिररिन्दम॥ ३६
शत्रुदमन! आप यहाँ पधारे, यह मेरे लिये सौभाग्यकी बात है। आपका मंगल हो। आपको विषय-भोगोंकी इच्छा है, उसकी पूर्तिके लिये मैं अपने साथियोंसहित सभी प्रकारके भोग प्रस्तुत करती रहूँगी॥ ३६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.25.36 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 537) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/25/36/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
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