श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.25.45

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

सप्तोपरि कृता द्वारः पुरस्तस्यास्तु द्वे अधः।

पृथग्विषयगत्यर्थं तस्यां यः कश्‍चनेश्‍वरः॥ ४५

saptopari kṛtā dvāraḥ purastasyāstu dve adhaḥ|

pṛthagviṣayagatyarthaṃ tasyāṃ yaḥ kaścaneśvaraḥ|| 45

अर्थ

उस नगरमें जो नौ द्वार थे, उनमेंसे सात नगरीके ऊपर और दो नीचे थे। उस नगरका जो कोई राजा होता, उसके पृथक्-पृथक् देशोंमें जानेके लिये ये द्वार बनाये गये थे॥ ४५॥✎ 1338 1339

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1338 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ति → निऋर्ऋति
  • #1339 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ऋति → निर्ऋति

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