श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.25.50

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

पितृहूर्नृप पुर्या द्वार्दक्षिणेन पुरंजनः।

राष्ट्रं दक्षिणपंचालं याति श्रुतधरान्वितः॥ ५०

pitṛhūrnṛpa puryā dvārdakṣiṇena puraṃjanaḥ|

rāṣṭraṃ dakṣiṇapaṃcālaṃ yāti śrutadharānvitaḥ|| 50

अर्थ

पुरीके दक्षिणकी ओर जो पितृहू नामका द्वार था, उसमें होकर राजा पुरंजन श्रुतधरके साथ दक्षिणपांचाल देशको जाता था॥ ५०॥✎ 1338 1339

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1338 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ति → निऋर्ऋति
  • #1339 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ऋति → निर्ऋति

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