श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.25.59

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

क्‍वचिद्धावति धावन्त्यां तिष्ठन्त्यामनु तिष्ठति।

अनु शेते शयानायामन्वास्ते क्‍वचिदासतीम्॥ ५९

kvaciddhāvati dhāvantyāṃ tiṣṭhantyāmanu tiṣṭhati|

anu śete śayānāyāmanvāste kvacidāsatīm|| 59

अर्थ

वह दौड़ती तो आप भी दौड़ने लगता, खड़ी होती तो आप भी खड़ा हो जाता, सोती तो आप भी उसीके साथ सो जाता और बैठती तो आप भी बैठ जाता॥ ५९॥

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