॥ श्रीहरिः ॥
आत्मानमर्हयांचक्रे धूपालेपस्रगादिभिः।
साध्वलङ्कृतसर्वांगो महिष्यामादधे मनः॥ १२
ātmānamarhayāṃcakre dhūpālepasragādibhiḥ|
sādhvalaṅkṛtasarvāṃgo mahiṣyāmādadhe manaḥ|| 12
अर्थ
फिर गन्ध, चन्दन और माला आदिसे सुसज्जित हो सब अंगोंमें सुन्दर-सुन्दर आभूषण पहने। तब उसे अपनी प्रियाकी याद आयी॥ १२॥
आत्मानमर्हयांचक्रे धूपालेपस्रगादिभिः।
साध्वलङ्कृतसर्वांगो महिष्यामादधे मनः॥ १२
फिर गन्ध, चन्दन और माला आदिसे सुसज्जित हो सब अंगोंमें सुन्दर-सुन्दर आभूषण पहने। तब उसे अपनी प्रियाकी याद आयी॥ १२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.26.12 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 541) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/26/12/