क्या कारण है आज इस घरकी सम्पत्ति पहले-जैसी सुहावनी नहीं जान पड़ती? घरमें माता अथवा पतिपरायणा भार्या न हो, तो वह घर बिना पहियेके रथके समान हो जाता है; फिर उसमें कौन बुद्धिमान् दीन पुरुषोंके समान रहना पसंद करेगा॥ १५॥
न तथैतर्हि रोचन्ते गृहेषु गृहसम्पदः।
यदि न स्याद् गृहे माता पत्नी वा पतिदेवता।
व्यंगे रथ इव प्राज्ञः को नामासीत दीनवत्॥ १५
क्या कारण है आज इस घरकी सम्पत्ति पहले-जैसी सुहावनी नहीं जान पड़ती? घरमें माता अथवा पतिपरायणा भार्या न हो, तो वह घर बिना पहियेके रथके समान हो जाता है; फिर उसमें कौन बुद्धिमान् दीन पुरुषोंके समान रहना पसंद करेगा॥ १५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.26.15 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 541) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/26/15/