श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.26.24

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

तस्मिन्दधे दममहं तव वीरपत्नि

योऽन्यत्र भूसुरकुलात्कृतकिल्बिषस्तम्।

पश्ये न वीतभयमुन्मुदितं त्रिलोक्या-

मन्यत्र वै मुररिपोरितरत्र दासात्॥ २४

tasmindadhe damamahaṃ tava vīrapatni

yo'nyatra bhūsurakulātkṛtakilbiṣastam|

paśye na vītabhayamunmuditaṃ trilokyā-

manyatra vai murariporitaratra dāsāt|| 24

अर्थ

वीरपत्नि! यदि किसी दूसरेने तुम्हारा कोई अपराध किया हो तो उसे बताओ; यदि वह अपराधी ब्राह्मणकुलका नहीं है, तो मैं उसे अभी दण्ड देता हूँ। मुझे तो भगवान्‌के भक्तोंको छोड़कर त्रिलोकीमें अथवा उससे बाहर ऐसा कोई नहीं दिखायी देता जो तुम्हारा अपराध करके निर्भय और आनन्दपूर्वक रह सके॥ २४॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें