श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.26.3

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

हैमोपस्करमारुह्य स्वर्णवर्माक्षयेषुधिः।

एकादशचमूनाथः पञ्चप्रस्थमगाद्वनम्॥ ३

haimopaskaramāruhya svarṇavarmākṣayeṣudhiḥ|

ekādaśacamūnāthaḥ pañcaprasthamagādvanam|| 3

अर्थ

श्रीनारदजी कहते हैं—राजन्! एक दिन राजा पुरंजन अपना विशाल धनुष, सोनेका कवच और अक्षय तरकस धारणकर अपने ग्यारहवें सेनापतिके साथ पाँच घोड़ोंके शीघ्रगामी रथमें बैठकर पंचप्रस्थ नामके वनमें गया। उस रथमें दो ईषादण्ड (बंब), दो पहिये, एक धुरी, तीन ध्वजदण्ड, पाँच डोरियाँ, एक लगाम, एक सारथि, एक बैठनेका स्थान, दो जुए, पाँच आयुध और सात आवरण थे। वह पाँच प्रकारकी चालोंसे चलता था तथा उसका साज-बाज सब सुनहरा था॥ १-३॥✎ 418

यह अर्थ श्लोक 1–3 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #418 शब्दोंके बीचका स्थान: (बंब),दो → (बंब), दो

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