इस समय आसुरीवृत्ति बढ़ जानेसे उसका चित्त बड़ा कठोर और दयाशून्य हो गया था, इससे उसने अपने तीखे बाणोंसे बहुत-से निर्दोष जंगली जानवरोंका वध कर डाला॥ ५॥✎ 418
आसुरीं वृत्तिमाश्रित्य घोरात्मा निरनुग्रहः।
न्यहनन्निशितैर्बाणैर्वनेषु वनगोचरान्॥ ५
इस समय आसुरीवृत्ति बढ़ जानेसे उसका चित्त बड़ा कठोर और दयाशून्य हो गया था, इससे उसने अपने तीखे बाणोंसे बहुत-से निर्दोष जंगली जानवरोंका वध कर डाला॥ ५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.26.5 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 540) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/26/5/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)