श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.27.19

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 27 · अथ सप्तविंशोऽध्यायः

कालस्य दुहिता काचित्त्रिलोकीं वरमिच्छती।

पर्यटन्ती न बर्हिष्मन् प्रत्यनन्दत कश्‍चन॥ १९

kālasya duhitā kācittrilokīṃ varamicchatī|

paryaṭantī na barhiṣman pratyanandata kaścana|| 19

अर्थ

बर्हिष्मन्! इन्हीं दिनों कालकी एक कन्या वरकी खोजमें त्रिलोकीमें भटकती रही, फिर भी उसे किसीने स्वीकार नहीं किया॥ १९॥

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