श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.27.2

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 27 · अथ सप्तविंशोऽध्यायः

स राजा महिषीं राजन् सुस्नातां रुचिराननाम्।

कृतस्वस्त्ययनां तृप्तामभ्यनन्ददुपागताम्॥ २

sa rājā mahiṣīṃ rājan susnātāṃ rucirānanām|

kṛtasvastyayanāṃ tṛptāmabhyanandadupāgatām|| 2

अर्थ

उसने अच्छी तरह स्नान कर अनेक प्रकारके मांगलिक शृंगार किये तथा भोजनादिसे तृप्त होकर वह राजाके पास आयी। राजाने उस मनोहर मुखवाली राजमहिषीका सादर अभिनन्दन किया॥ २॥

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