भद्र! इस समय मैं आपकी सेवामें उपस्थित हुई हूँ, आप मुझे स्वीकार करके अनुगृहीत कीजिये। पुरुषका सबसे बड़ा धर्म दीनोंपर दया करना ही है’॥ २६॥
अथो भजस्व मां भद्र भजन्तीं मे दयां कुरु।
एतावान् पौरुषो धर्मो यदार्ताननुकम्पते॥ २६
भद्र! इस समय मैं आपकी सेवामें उपस्थित हुई हूँ, आप मुझे स्वीकार करके अनुगृहीत कीजिये। पुरुषका सबसे बड़ा धर्म दीनोंपर दया करना ही है’॥ २६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.27.26 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 545) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/27/26/