श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.27.29

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 27 · अथ सप्तविंशोऽध्यायः

त्वमव्यक्तगतिर्भुङ्क्ष्व लोकं कर्मविनिर्मितम्।

याहि मे पृतनायुक्ता प्रजानाशं प्रणेष्यसि॥ २९

tvamavyaktagatirbhuṅkṣva lokaṃ karmavinirmitam|

yāhi me pṛtanāyuktā prajānāśaṃ praṇeṣyasi|| 29

अर्थ

‘मैंने योगदृष्टिसे देखकर तेरे लिये एक पति निश्‍चय किया है। तू सबका अनिष्ट करनेवाली है, इसलिये किसीको भी अच्छी नहीं लगती और इसीसे लोग तुझे स्वीकार नहीं करते। अतः इस कर्मजनित लोकको तू अलक्षित होकर बलात् भोग। तू मेरी सेना लेकर जा; इसकी सहायतासे तू सारी प्रजाका नाश करनेमें समर्थ होगी, कोई भी तेरा सामना न कर सकेगा॥ २८-२९॥

यह अर्थ श्लोक 28–29 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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