श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.28.1

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

अथाष्टाविंशोऽध्यायः

पुरंजनको स्त्रीयोनिकी प्राप्ति और अविज्ञातके उपदेशसे उसका मुक्त होना

नारद उवाच

सैनिका भयनाम्नो ये बर्हिष्मन् दिष्टकारिणः।

प्रज्वारकालकन्याभ्यां विचेरुरवनीमिमाम्॥ १

sainikā bhayanāmno ye barhiṣman diṣṭakāriṇaḥ|

prajvārakālakanyābhyāṃ viceruravanīmimām|| 1

अर्थ

श्रीनारदजी कहते हैं—राजन्! फिर भय नामक यवनराजके आज्ञाकारी सैनिक प्रज्वार और कालकन्याके साथ इस पृथ्वीतलपर सर्वत्र विचरने लगे॥ १॥

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