श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.28.17

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

अहं ममेति स्वीकृत्य गृहेषु कुमतिर्गृही।

दध्यौ प्रमदया दीनो विप्रयोग उपस्थिते॥ १७

ahaṃ mameti svīkṛtya gṛheṣu kumatirgṛhī|

dadhyau pramadayā dīno viprayoga upasthite|| 17

अर्थ

गृहासक्त पुरंजन देह-गेहादिमें मैं-मेरेपनका भाव रखनेसे अत्यन्त बुद्धिहीन हो गया था। स्त्रीके प्रेमपाशमें फँसकर वह बहुत दीन हो गया था। अब जब इनसे बिछुड़नेका समय उपस्थित हुआ, तब वह अपने पुत्री, पुत्र, पौत्र, पुत्रवधू, दामाद, नौकर और घर, खजाना तथा अन्यान्य जिन पदार्थोंमें उसकी ममताभर शेष थी (उनका भोग तो कभीका छूट गया था), उन सबके लिये इस प्रकार चिन्ता करने लगा॥ १६-१७॥

यह अर्थ श्लोक 16–17 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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