श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.28.3

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

कालकन्यापि बुभुजे पुरंजनपुरं बलात्।

ययाभिभूतः पुरुषः सद्यो निःसारतामियात्॥ ३

kālakanyāpi bubhuje puraṃjanapuraṃ balāt|

yayābhibhūtaḥ puruṣaḥ sadyo niḥsāratāmiyāt|| 3

अर्थ

तब, जिसके चंगुलमें फँसकर पुरुष शीघ्र ही निःसार हो जाता है, वह कालकन्या बलात् उस पुरीकी प्रजाको भोगने लगी॥ ३॥

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