भाई! उस नगरमें उसकी स्वामिनीके फंदेमें पड़कर उसके साथ विहार करते-करते तुम भी अपने स्वरूपको भूल गये और उसीके संगसे तुम्हारी यह दुर्दशा हुई है ॥ ५९॥
तस्मिंस्त्वं रामया स्पृष्टो रममाणोऽश्रुतस्मृतिः।
तत्संगादीदृशीं प्राप्तो दशां पापीयसीं प्रभो॥ ५९
भाई! उस नगरमें उसकी स्वामिनीके फंदेमें पड़कर उसके साथ विहार करते-करते तुम भी अपने स्वरूपको भूल गये और उसीके संगसे तुम्हारी यह दुर्दशा हुई है ॥ ५९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.28.59 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 552) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/28/59/