श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.28.61

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

माया ह्येषा मया सृष्टा यत्पुमांसं स्त्रियं सतीम्१।

मन्यसे नोभयं यद्वै हंसौ पश्यावयोर्गतिम्॥ ६१

māyā hyeṣā mayā sṛṣṭā yatpumāṃsaṃ striyaṃ satīm|

manyase nobhayaṃ yadvai haṃsau paśyāvayorgatim|| 61

अर्थ

तुम पहले जन्ममें अपनेको पुरुष समझते थे और अब सती स्त्री मानते हो—यह सब मेरी ही फैलायी हुई माया है। वास्तवमें तुम न पुरुष हो न स्त्री। हम दोनों तो हंस हैं; हमारा जो वास्तविक स्वरूप है, उसका अनुभव करो॥ ६१॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—ततः।

    (मुद्रित पृष्ठ 552)

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