श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.28.63

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

यथा पुरुष आत्मानमेकमादर्शचक्षुषोः।

द्विधाभूतमवेक्षेत तथैवान्तरमावयोः॥ ६३

yathā puruṣa ātmānamekamādarśacakṣuṣoḥ|

dvidhābhūtamavekṣeta tathaivāntaramāvayoḥ|| 63

अर्थ

जैसे एक पुरुष अपने शरीरकी परछाईंको शीशेमें और किसी व्यक्तिके नेत्रमें भिन्‍न-भिन्‍न रूपसे देखता है वैसे ही—एक ही आत्मा विद्या और अविद्याकी उपाधिके भेदसे अपनेको ईश्‍वर और जीवके रूपमें दो प्रकारसे देख रहा है॥ ६३॥

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