॥ श्रीहरिः ॥
बर्हिष्मन्नेतदध्यात्मं पारोक्ष्येण प्रदर्शितम्।
यत्परोक्षप्रियो देवो भगवान् विश्वभावनः॥ ६५
barhiṣmannetadadhyātmaṃ pārokṣyeṇa pradarśitam|
yatparokṣapriyo devo bhagavān viśvabhāvanaḥ|| 65
अर्थ
प्राचीनबर्हि! मैंने तुम्हें परोक्षरूपसे यह आत्मज्ञानका दिग्दर्शन कराया है; क्योंकि जगत्कर्ता जगदीश्वरको परोक्ष वर्णन ही अधिक प्रिय है॥ ६५॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे
पुरंजनोपाख्यानेऽष्टाविंशोऽध्यायः॥ २८॥
बर्हिष्मन्नेतदध्यात्मं पारोक्ष्येण प्रदर्शितम्।
यत्परोक्षप्रियो देवो भगवान् विश्वभावनः॥ ६५
प्राचीनबर्हि! मैंने तुम्हें परोक्षरूपसे यह आत्मज्ञानका दिग्दर्शन कराया है; क्योंकि जगत्कर्ता जगदीश्वरको परोक्ष वर्णन ही अधिक प्रिय है॥ ६५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.28.65 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 552) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/28/65/