दोनों नासाछिद्र ही नलिनी और नालिनी नामके द्वार हैं और नासिकाका विषय गन्ध ही सौरभ देश है तथा घ्राणेन्द्रिय अवधूत नामका मित्र है। मुख मुख्य नामका द्वार है। उसमें रहनेवाला वागिन्द्रिय विपण है और रसनेन्द्रिय रसविद् (रसज्ञ) नामका मित्र है॥ ११॥✎ 13431344
नलिनी नालिनी नासे गन्धः सौरभ उच्यते।
घ्राणोऽवधूतो मुख्यास्यं विपणो वाग्रसविद्रसः॥ ११
दोनों नासाछिद्र ही नलिनी और नालिनी नामके द्वार हैं और नासिकाका विषय गन्ध ही सौरभ देश है तथा घ्राणेन्द्रिय अवधूत नामका मित्र है। मुख मुख्य नामका द्वार है। उसमें रहनेवाला वागिन्द्रिय विपण है और रसनेन्द्रिय रसविद् (रसज्ञ) नामका मित्र है॥ ११॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.29.11 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 554) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/29/11/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#1343 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ति → निऋर्ऋति
#1344 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ऋति → निर्ऋति