श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.29.14

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

आसुरी मेढ्रमर्वाग्द्वार्व्यवायो ग्रामिणां रतिः।

उपस्थो दुर्मदः प्रोक्तो निर्ऋतिर्गुद उच्यते॥ १४✎ 1039 1040

āsurī meḍhramarvāgdvārvyavāyo grāmiṇāṃ ratiḥ|

upastho durmadaḥ prokto nir:ṛtirguda ucyate|| 14

अर्थ

लिंग ही आसुरी नामका पश्चिमी द्वार है, स्त्रीप्रसंग ग्रामक नामका देश है और लिंगमें रहनेवाला उपस्थेन्द्रिय दुर्मद नामका मित्र है। गुदा निर्ऋति नामका पश्चिमी द्वार है॥ १४॥✎ 1343 1344

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #1039 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्तिर्गुद → निऋर्ऋतिर्गुद
  • #1040 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ऋतिर्गुद → निर्ऋतिर्गुद
  • #1343 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ति → निऋर्ऋति
  • #1344 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ऋति → निर्ऋति

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें