तत्र मोहं प्रसादं वा हर्षं प्राप्नोति तद्गुणैः॥ १६
antaḥpuraṃ ca hṛdayaṃ viṣūcirmana ucyate|
tatra mohaṃ prasādaṃ vā harṣaṃ prāpnoti tadguṇaiḥ|| 16
अर्थ
हृदय अन्तःपुर है, उसमें रहनेवाला मन ही विषूचि (विषूचीन) नामका प्रधान सेवक है। जीव उस मनके सत्त्वादि गुणोंके कारण ही प्रसन्नता, हर्षरूप विकार अथवा मोहको प्राप्त होता है॥ १६॥✎ 13431344
अन्तःपुरं च हृदयं विषूचिर्मन उच्यते।
तत्र मोहं प्रसादं वा हर्षं प्राप्नोति तद्गुणैः॥ १६
हृदय अन्तःपुर है, उसमें रहनेवाला मन ही विषूचि (विषूचीन) नामका प्रधान सेवक है। जीव उस मनके सत्त्वादि गुणोंके कारण ही प्रसन्नता, हर्षरूप विकार अथवा मोहको प्राप्त होता है॥ १६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.29.16 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 554) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/29/16/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#1343 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ति → निऋर्ऋति
#1344 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ऋति → निर्ऋति