श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.29.21

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

संवत्सरश्‍चण्डवेगः कालो येनोपलक्षितः।

तस्याहानीह गन्धर्वा गन्धर्व्यो रात्रयः स्मृताः।

हरन्त्यायुः परिक्रान्त्या षष्ट्युत्तरशतत्रयम्॥ २१

saṃvatsaraścaṇḍavegaḥ kālo yenopalakṣitaḥ|

tasyāhānīha gandharvā gandharvyo rātrayaḥ smṛtāḥ|

harantyāyuḥ parikrāntyā ṣaṣṭyuttaraśatatrayam|| 21

अर्थ

जिसके द्वारा कालका ज्ञान होता है, वह संवत्सर ही चण्डवेग नामक गन्धर्वराज है। उसके अधीन जो तीन सौ साठ गन्धर्व बताये गये थे, वे दिन हैं और तीन सौ साठ गन्धर्वियाँ रात्रि हैं। ये बारी-बारीसे चक्कर लगाते हुए मनुष्यकी आयुको हरते रहते हैं॥ २१॥

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