इस प्रकार यह देहाभिमानी जीव अज्ञानसे आच्छादित होकर अनेक प्रकारके आधिभौतिक, आध्यात्मिक और आधिदैविक कष्ट भोगता हुआ सौ वर्षतक मनुष्यशरीरमें पड़ा रहता है॥ २४॥✎ 134513461347
एवं बहुविधैर्दुःखैर्दैवभूतात्मसम्भवैः।
क्लिश्यमानः शतं वर्षं देहे देही तमोवृतः॥ २४
इस प्रकार यह देहाभिमानी जीव अज्ञानसे आच्छादित होकर अनेक प्रकारके आधिभौतिक, आध्यात्मिक और आधिदैविक कष्ट भोगता हुआ सौ वर्षतक मनुष्यशरीरमें पड़ा रहता है॥ २४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.29.24 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 556) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/29/24/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
#1345 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): स्व-रूपको → स्वरूपको
#1346 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): विषयों-का → विषयोंका
#1347 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): मनुष्य-शरीरमें → मनुष्यशरीरमें