श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.29.27

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

गुणाभिमानी स तदा कर्माणि कुरुतेऽवशः।

शुक्लं कृष्णं लोहितं वा१ यथाकर्माभिजायते॥ २७

guṇābhimānī sa tadā karmāṇi kurute'vaśaḥ|

śuklaṃ kṛṣṇaṃ lohitaṃ vā yathākarmābhijāyate|| 27

अर्थ

उन गुणोंका अभिमानी होनेसे वह विवश होकर सात्त्विक, राजस और तामस कर्म करता है तथा उन कर्मोंके अनुसार भिन्‍न-भिन्‍न योनियोंमें जन्म लेता है॥ २७॥✎ 1345 1346 1347

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—च यथा समभिजायते।

    (मुद्रित पृष्ठ 556)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #1345 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): स्व-रूपको → स्वरूपको
  • #1346 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): विषयों-का → विषयोंका
  • #1347 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): मनुष्य-शरीरमें → मनुष्यशरीरमें

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