उन गुणोंका अभिमानी होनेसे वह विवश होकर सात्त्विक, राजस और तामस कर्म करता है तथा उन कर्मोंके अनुसार भिन्न-भिन्न योनियोंमें जन्म लेता है॥ २७॥✎ 134513461347
गुणाभिमानी स तदा कर्माणि कुरुतेऽवशः।
शुक्लं कृष्णं लोहितं वा यथाकर्माभिजायते॥ २७
उन गुणोंका अभिमानी होनेसे वह विवश होकर सात्त्विक, राजस और तामस कर्म करता है तथा उन कर्मोंके अनुसार भिन्न-भिन्न योनियोंमें जन्म लेता है॥ २७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.29.27 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 556) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/29/27/
टिप्पणियाँ
१
प्रा० पा०—च यथा समभिजायते।
(मुद्रित पृष्ठ 556)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
#1345 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): स्व-रूपको → स्वरूपको
#1346 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): विषयों-का → विषयोंका
#1347 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): मनुष्य-शरीरमें → मनुष्यशरीरमें