श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.29.3

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

योऽविज्ञाताहृतस्तस्य पुरुषस्य सखेश्‍वरः।

यन्‍न विज्ञायते पुम्भिर्नामभिर्वा क्रियागुणैः॥ ३

yo'vijñātāhṛtastasya puruṣasya sakheśvaraḥ|

yanna vijñāyate pumbhirnāmabhirvā kriyāguṇaiḥ|| 3

अर्थ

उस जीवका सखा जो अविज्ञात नामसे कहा गया है, वह ईश्‍वर है; क्योंकि किसी भी प्रकारके नाम, गुण अथवा कर्मोंसे जीवोंको उसका पता नहीं चलता॥ ३॥✎ 1342

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1342 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): वृत्तियों-वाला → वृत्तियोंवाला

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