उस जीवका सखा जो अविज्ञात नामसे कहा गया है, वह ईश्वर है; क्योंकि किसी भी प्रकारके नाम, गुण अथवा कर्मोंसे जीवोंको उसका पता नहीं चलता॥ ३॥✎ 1342
योऽविज्ञाताहृतस्तस्य पुरुषस्य सखेश्वरः।
यन्न विज्ञायते पुम्भिर्नामभिर्वा क्रियागुणैः॥ ३
उस जीवका सखा जो अविज्ञात नामसे कहा गया है, वह ईश्वर है; क्योंकि किसी भी प्रकारके नाम, गुण अथवा कर्मोंसे जीवोंको उसका पता नहीं चलता॥ ३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.29.3 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 553) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/29/3/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1342 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): वृत्तियों-वाला → वृत्तियोंवाला