श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.29.43

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

मरीचिरत्र्यङ्‌गिरसौ पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः।

भृगुर्वसिष्ठ इत्येते मदन्ता ब्रह्मवादिनः॥ ४३

marīciratryaṅgirasau pulastyaḥ pulahaḥ kratuḥ|

bhṛgurvasiṣṭha ityete madantā brahmavādinaḥ|| 43

अर्थ

साक्षात् प्रजापतियोंके पति ब्रह्माजी, भगवान् शंकर, स्वायम्भुव मनु, दक्षादि प्रजापतिगण, सनकादि नैष्ठिक ब्रह्मचारी, मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, भृगु, वसिष्ठ और मैं—ये जितने ब्रह्मवादी मुनिगण हैं, समस्त वाङ्मयके अधिपति होनेपर भी तप, उपासना और समाधिके द्वारा ढूँढ़-ढूँढ़कर हार गये, फिर भी उस सर्वसाक्षी परमेश्‍वरको आजतक न देख सके॥ ४२—४४॥

यह अर्थ श्लोक 42–44 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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