श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.29.46

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

यदा यमनुगृह्णाति भगवानात्मभावितः।

स जहाति मतिं लोके वेदे च परिनिष्ठिताम्॥ ४६

yadā yamanugṛhṇāti bhagavānātmabhāvitaḥ|

sa jahāti matiṃ loke vede ca pariniṣṭhitām|| 46

अर्थ

हृदयमें बार-बार चिन्तन किये जानेपर भगवान् जिस समय जिस जीवपर कृपा करते हैं, उसी समय वह लौकिक व्यवहार एवं वैदिक कर्म-मार्गकी बद्धमूल आस्थासे छुट्टी पा जाता है॥ ४६॥

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