श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.29.52

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

नारद उवाच

प्रश्न एवं हि संछिन्‍नो भवतः पुरुषर्षभ।

अत्र मे वदतो गुह्यं निशामय सुनिश्चितम्॥ ५२

praśna evaṃ hi saṃchinno bhavataḥ puruṣarṣabha|

atra me vadato guhyaṃ niśāmaya suniścitam|| 52

अर्थ

श्रीनारदजी कहते हैं—पुरुषश्रेष्ठ! यहाँतक जो कुछ कहा गया है, उससे तुम्हारे प्रश्नका उत्तर हो गया। अब मैं एक भलीभाँति निश्चित किया हुआ गुप्त साधन बताता हूँ, ध्यान देकर सुनो॥ ५२॥

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