श्रद्धत्स्वाननुभूतोऽर्थो न मनः स्प्रष्टुमर्हति॥ ६५
tenāsya tādṛśaṃ rājam̐lliṃgino dehasambhavam|
śraddhatsvānanubhūto'rtho na manaḥ spraṣṭumarhati|| 65
अर्थ
राजन्! तुम निश्चय मानो कि लिंगदेहके अभिमानी जीवको उसका अनुभव पूर्वजन्ममें हो चुका है; क्योंकि जो वस्तु पहले अनुभव की हुई नहीं होती, उसकी मनमें वासना भी नहीं हो सकती॥ ६५॥
तेनास्य तादृशं राजँल्लिंगिनो देहसम्भवम्।
श्रद्धत्स्वाननुभूतोऽर्थो न मनः स्प्रष्टुमर्हति॥ ६५
राजन्! तुम निश्चय मानो कि लिंगदेहके अभिमानी जीवको उसका अनुभव पूर्वजन्ममें हो चुका है; क्योंकि जो वस्तु पहले अनुभव की हुई नहीं होती, उसकी मनमें वासना भी नहीं हो सकती॥ ६५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.29.65 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 561) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/29/65/