श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.29.72

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

गर्भे बाल्येऽप्यपौष्कल्यादेकादशविधं तदा२।

लिंगं न दृश्यते यूनः कुह्वां चन्द्रमसो यथा॥ ७२

garbhe bālye'pyapauṣkalyādekādaśavidhaṃ tadā|

liṃgaṃ na dṛśyate yūnaḥ kuhvāṃ candramaso yathā|| 72

अर्थ

जिस प्रकार अमावास्याकी रात्रिमें चन्द्रमा रहते हुए भी दिखायी नहीं देता, उसी प्रकार युवावस्थामें स्पष्ट प्रतीत होनेवाला यह एकादश इन्द्रियविशिष्ट लिंगशरीर गर्भावस्था और बाल्यकालमें रहते हुए भी इन्द्रियोंका पूर्ण विकास न होनेके कारण प्रतीत नहीं होता॥ ७२॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—तथा।

    (मुद्रित पृष्ठ 562)

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