liṃgaṃ na dṛśyate yūnaḥ kuhvāṃ candramaso yathā|| 72
अर्थ
जिस प्रकार अमावास्याकी रात्रिमें चन्द्रमा रहते हुए भी दिखायी नहीं देता, उसी प्रकार युवावस्थामें स्पष्ट प्रतीत होनेवाला यह एकादश इन्द्रियविशिष्ट लिंगशरीर गर्भावस्था और बाल्यकालमें रहते हुए भी इन्द्रियोंका पूर्ण विकास न होनेके कारण प्रतीत नहीं होता॥ ७२॥
गर्भे बाल्येऽप्यपौष्कल्यादेकादशविधं तदा।
लिंगं न दृश्यते यूनः कुह्वां चन्द्रमसो यथा॥ ७२
जिस प्रकार अमावास्याकी रात्रिमें चन्द्रमा रहते हुए भी दिखायी नहीं देता, उसी प्रकार युवावस्थामें स्पष्ट प्रतीत होनेवाला यह एकादश इन्द्रियविशिष्ट लिंगशरीर गर्भावस्था और बाल्यकालमें रहते हुए भी इन्द्रियोंका पूर्ण विकास न होनेके कारण प्रतीत नहीं होता॥ ७२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.29.72 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 562) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/29/72/