श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.3.15

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

ऋषिरुवाच

एवं गिरित्रः प्रिययाभिभाषितः

प्रत्यभ्यधत्त प्रहसन् सुहृत्प्रियः।

संस्मारितो मर्मभिदः कुवागिषून्

यानाह को विश्‍वसृजां समक्षतः॥ १५

evaṃ giritraḥ priyayābhibhāṣitaḥ

pratyabhyadhatta prahasan suhṛtpriyaḥ|

saṃsmārito marmabhidaḥ kuvāgiṣūn

yānāha ko viśvasṛjāṃ samakṣataḥ|| 15

अर्थ

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—प्रिया सतीजीके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर अपने आत्मीयोंका प्रिय करनेवाले भगवान् शंकरको दक्षप्रजापतिके उन मर्मभेदी दुर्वचनरूप बाणोंका स्मरण हो आया, जो उन्होंने समस्त प्रजापतियोंके सामने कहे थे; तब वे हँसकर बोले॥ १५॥

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