श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.3.18

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

नैतादृशानां स्वजनव्यपेक्षया

गृहान् प्रतीयादनवस्थितात्मनाम्।

येऽभ्यागतान् वक्रधियाभिचक्षते

आरोपितभ्रूभिरमर्षणाक्षिभिः ॥ १८

naitādṛśānāṃ svajanavyapekṣayā

gṛhān pratīyādanavasthitātmanām|

ye'bhyāgatān vakradhiyābhicakṣate

āropitabhrūbhiramarṣaṇākṣibhiḥ || 18

अर्थ

इसीसे जो अपने यहाँ आये हुए पुरुषोंको कुटिल बुद्धिसे भौं चढ़ाकर रोषभरी दृष्टिसे देखते हैं, उन अव्यवस्थितचित्त लोगोंके यहाँ ‘ये हमारे बान्धव हैं’ ऐसा समझकर कभी नहीं जाना चाहिये॥ १८॥

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