श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.3.5

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

तदुपश्रुत्य नभसि खेचराणां प्रजल्पताम्।

सती दाक्षायणी देवी पितुर्यज्ञमहोत्सवम्॥ ५

tadupaśrutya nabhasi khecarāṇāṃ prajalpatām|

satī dākṣāyaṇī devī pituryajñamahotsavam|| 5

अर्थ

उस समय आकाशमार्गसे जाते हुए देवता आपसमें उस यज्ञकी चर्चा करते जाते थे। उनके मुखसे दक्षकुमारी सतीने अपने पिताके घर होनेवाले यज्ञकी बात सुन ली॥ ५॥

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