na muhyanti na śocanti na hṛṣyanti yato gatāḥ|| 20
अर्थ
वे नित्यप्रति मेरी लीलाएँ सुनते रहते हैं, इसलिये ब्रह्मवादी वक्ताओंके द्वारा मैं ज्ञानस्वरूप परब्रह्म उनके हृदयमें नित्य नया-नया-सा भासता रहता हूँ और मुझे प्राप्त कर लेनेपर जीवोंको न मोह हो सकता है, न शोक और न हर्ष ही॥ २०॥✎ 1915
नव्यवद्धृदये यज्ज्ञो ब्रह्मैतद्ब्रह्मवादिभिः।
न मुह्यन्ति न शोचन्ति न हृष्यन्ति यतो गताः॥ २०
वे नित्यप्रति मेरी लीलाएँ सुनते रहते हैं, इसलिये ब्रह्मवादी वक्ताओंके द्वारा मैं ज्ञानस्वरूप परब्रह्म उनके हृदयमें नित्य नया-नया-सा भासता रहता हूँ और मुझे प्राप्त कर लेनेपर जीवोंको न मोह हो सकता है, न शोक और न हर्ष ही॥ २०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.30.20 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 566) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/30/20/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1915 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): ज्ञान-स्वरूप → ज्ञानस्वरूप