श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.30.28

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 30 · अथ त्रिंशोऽध्यायः

एतावत्त्वं हि विभुभिर्भाव्यं दीनेषु वत्सलैः।

यदनुस्मर्यते काले स्वबुद्ध्याभद्ररन्धन॥ २८

etāvattvaṃ hi vibhubhirbhāvyaṃ dīneṣu vatsalaiḥ|

yadanusmaryate kāle svabuddhyābhadrarandhana|| 28

अर्थ

अमंगलहारी प्रभो! दीनोंपर दया करनेवाले समर्थ पुरुषोंको इतनी ही कृपा करनी चाहिये कि समय-समयपर उन दीनजनोंको ‘ये हमारे हैं’ इस प्रकार स्मरण कर लिया करें॥ २८॥

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