श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.30.38

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 30 · अथ त्रिंशोऽध्यायः

वयं तु साक्षाद्भगवन् भवस्य

प्रियस्य सख्युः क्षणसंगमेन।

सुदुश्चिकित्स्यस्य भवस्य मृत्यो-

र्भिषक्तमं त्वाद्य गतिं गताः स्मः॥ ३८

vayaṃ tu sākṣādbhagavan bhavasya

priyasya sakhyuḥ kṣaṇasaṃgamena|

suduścikitsyasya bhavasya mṛtyo-

rbhiṣaktamaṃ tvādya gatiṃ gatāḥ smaḥ|| 38

अर्थ

भगवन्! आपके प्रिय सखा भगवान् शंकरके क्षणभरके समागमसे ही आज हमें आपका साक्षात् दर्शन प्राप्त हुआ है। आप जन्म-मरणरूप दुःसाध्य रोगके श्रेष्ठतम वैद्य हैं, अतः अब हमने आपका ही आश्रय लिया है॥ ३८॥

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