॥ श्रीहरिः ॥
एतत्तेऽभिहितं क्षत्तर्यन्मां त्वं परिपृष्टवान्।
प्रचेतसां नारदस्य संवादं हरिकीर्तनम्॥ २५
etatte'bhihitaṃ kṣattaryanmāṃ tvaṃ paripṛṣṭavān|
pracetasāṃ nāradasya saṃvādaṃ harikīrtanam|| 25
अर्थ
इस प्रकार आपने जो मुझसे श्रीनारदजी और प्रचेताओंके भगवत्कथासम्बन्धी संवादके विषयमें पूछा था, वह मैंने आपको सुना दिया॥ २५॥
एतत्तेऽभिहितं क्षत्तर्यन्मां त्वं परिपृष्टवान्।
प्रचेतसां नारदस्य संवादं हरिकीर्तनम्॥ २५
इस प्रकार आपने जो मुझसे श्रीनारदजी और प्रचेताओंके भगवत्कथासम्बन्धी संवादके विषयमें पूछा था, वह मैंने आपको सुना दिया॥ २५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.31.25 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 573) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/31/25/