श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.31.7

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

तन्‍नः प्रद्योतयाध्यात्मज्ञानं३ तत्त्वार्थदर्शनम्।

येनांजसा तरिष्यामो दुस्तरं भवसागरम्॥ ७

tannaḥ pradyotayādhyātmajñānaṃ tattvārthadarśanam|

yenāṃjasā tariṣyāmo dustaraṃ bhavasāgaram|| 7

अर्थ

अतः आप हमारे हृदयोंमें उस परमार्थतत्त्वका साक्षात्कार करानेवाले अध्यात्मज्ञानको फिर प्रकाशित कर दीजिये, जिससे हम सुगमतासे ही इस दुस्तर संसार-सागरसे पार हो जायँ॥ ७॥

टिप्पणियाँ

  1. ३

    प्रा० पा०—ध्यात्मं ज्ञानं।

    (मुद्रित पृष्ठ 570)

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें